झाबुआ-आलीराजपुर। आदिवासियों के रंग-रंगीले और सांस्कृतिक पर्व भगोरिया के मेले गुलजार हैं। तीसरे दिन शनिवार को झाबुआ के मेघनगर, रानापुर, बामनिया, झकनावदा और आलीराजपुर के नानपुर व उमराली में मेले लेगे। आलीराजपुर के उमराली में भगोरिया की आत्मा कहा जाने वाला नजारा दिखा। दरअसल, भगोरिया मेले की परंपरा है कि मेले में आई किसी युवती को आदिवासी युवक पसंद करता है और उसे साथ ले जाता है। उमराली में यही परंपरा का नजारा...

जानिए क्या है भगोरिया उत्सव

भगोरिया एक उत्सव है जो होली का ही एक रूप है। यह मध्य प्रदेश के मालवा अंचल (धार, झाबुआ, खरगोन आदि) के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। भगोरिया के समय धार, झाबुआ, खरगोन आदि क्षेत्रों के हाट-बाजार मेले का रूप ले लेते हैं और हर तरफ फागुन और प्यार का रंग बिखरा नजर आता है।
भगोरिया हाट-बाजारों में युवक-युवती बेहद सजधज कर अपने भावी जीवनसाथी को ढूँढने आते हैं। इनमें आपसी रजामंदी जाहिर करने का तरीका भी बेहद निराला होता है। सबसे पहले लड़का लड़की को पान खाने के लिए देता है। यदि लड़की पान खा ले तो हां समझी जाती है। इसके बाद लड़का लड़की को लेकर भगोरिया हाट से भाग जाता है और दोनों विवाह कर लेते हैं। इसी तरह यदि लड़का लड़की के गाल पर गुलाबी रंग लगा दे और जवाब में लड़की भी लड़के के गाल पर गुलाबी रंग मल दे तो भी रिश्ता तय माना जाता है।

रियासत काल से चल रही
धुलेंडी के सात दिन पहले से यह पर्व आरंभ हो जाता है। रियासत काल से ही यह पारंपारिक त्योहार यहां चल रहा है। पर्व को लेकर अलग-अलग इतिहास भी बताए जाते है। कुछ इतिहासकार कहते है कि ग्राम भगोर से यह पर्व आरंभ हुआ, इसलिए इसका नाम भगोरिया पड़ गया।
कुछ लोगों का मानना है कि होली के पूर्व लगने वाले हाटों को गुलालिया हाट कहा जाता था। इसमें खूब गुलाल उड़ती थी। बाद में होली के पूर्व मनाए जाने वाले इन साप्ताहिक हाटों को भगोरिया कहा जाने लगा। मान्यता चाहे जो हो, लेकिन मैदानी हकीकत यह है कि यह वार्षिक पर्व अपनी संस्कृति की सुगंध हमेशा से चारो ओर बिखेर रहा है।