भोपालपट्टनम। महाशिवरात्री के मौके पर सोमवार से तीन दिवसीय मेले की शुरूआत भोपालपट्टनम में हो गई है। बीजापुर जिले के इस सीमावर्ती शहर का यह प्राचीन मंदिर अपनी अनूठी निर्मांण शैली के प्रसिद्ध है। माना जाता है कि 10वीं से 11वीं शताब्दी के बीच नागवंशीय राजाओं ने इस मंदिर का निर्मांण कराया था। करीब 1 हजार साल बाद आज भी यह मंदिर यहां के लोगों के लिए आस्था का एक बड़ा केंद्र बना हुआ है।

भोपालपटनम का शिवमंदिर वैसे तो बहुत पुराना है। मगर इसका जीर्णोद्घार कई बार हुआ है। मंदिर का गर्भगृह नागकालीन शैली में निर्मित है। यहां स्थापित पार्वती गौरी, गणेश और नाग प्रतिमाओं को देखने पर यही लगता है कि ये नागकालीन प्रतिमाएं हैं। बाहर रखी प्राचीन प्रतिमाएं जो खण्डित हैं, वे भी इस बात की पुष्टि करती हैं।
कुछ प्रतिमाएं बड़े तालाब के पीछे भी हैं। इन सबको देखकर लगता है कि नागवंशी राजाओं ने यहां मंदिर बनवाया होगा। बाद में काकतीय अन्नमदेव के साथ वारंगल से आए उनके विश्वस्त सहयोगी सूर्यवीर पामभोई तब के भूपालपट्टनमु यानी आज के भोपालपटनम के क्षत्रप या जमींदार बने।

उनके वंशजों ने इस मंदिर का कुछ रख-रखाव किया, लेकिन इसका प्रथम जीर्णोद्घार सन 1921 में तब के टीमेड यानी सागौन व्यापारी तिमेड़ के तंजावुरों के पूर्वजों ने कराया था। उनके स्मारक आज भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में तिमेड़ में मौजूद हैं। उन्होंने गर्भगृह की मरम्मत के अलावा उसके सामने मंडप का निर्माण कर मंदिर का विस्तार भी किया था।
तब समारोहपूर्वक गर्भगृह के शिखर पर कलश-स्थापन भी किया गया था। उस कलश पर वर्ष 1921अंकित था। तिमेड़ के तंजावुर वंशज टी. मोहनराव ने अपने पिता टी. सुब्रमण्यम के हवाले से बताया कि तब दीपावली के अवसर पर पांच दिन तिमेड़ से भोपालपटनम के शिवमंदिर तक घी के दीपक जलाए जाते थे।
इस मंदिर का दूसरी बार जीर्णोद्वार और वर्तमान भव्यस्वरूप में विस्तार स्व. कोण्ड्रा रामचन्द्रम के नेतृत्व में 1980-81में कराया गया था। तब वन विभाग के अधिकारी रामवीर सिंह और श्री पाठक ने जन सहयोग से राशि जुटाने और निर्माण कार्य में उनकी भरपूर मदद की थी।

भोपालपटनम के प्रबुद्घ और व्यापारी वर्ग ने भी खुले मन से सहयोग किया था। मंदिर के जीर्णोद्घार और नवीनीकरण के बाद 1981में पुनः कलश-स्थापन समारोह हुआ था। उसी अवसर पहली बार मेला भरा था। तब से प्रति वर्ष महाशिवरात्रि को तीन दिवसीय मेले का आयोजन मंदिर समति की देखरेख में किया जाता है।
महाशिवरात्रि को शिवकल्याणोत्सव होता है,जिसके अंतर्गत शिवरात्रि की पूर्व संध्या को शिव-बारात की शोभायात्रा निकाली जाती है। बारात का स्वागत (एदुरुकोल्लू) कन्यापक्ष द्वारा किया जाता है।