प्रयागराजः प्रयागराज कुंभ का वैभव पूरी दुनिया ने देखा, प्रयागराज कुंभ की परंपराओं को पूरी दुनिया ने महसूस किया. लगभग डेढ़ महीने के कुंभ में दुनिया भर के करोड़ों लोगों ने प्रयागराज में कुंभ का स्नान किया, कुंभ का दर्शन किया और कुंभ की यादों में अपने ज़हन की पोटली में समेट कर ले गए. लेकिन अब वही प्रयागराज कुंभ केवल यादों की तस्वीरों में सिमटने लगा है. संत जा रहे हैं, जनता जा रही है, अदृश्य रूप से कुंभ में विराजमान जनार्दन जा रहे हैं. जा रहा है सनातन संस्कृति की सजीव परंपरा का सिलसिला और परंपरा का ये क्रम कढ़ी पकोड़े की थाली में सिमट कर अपने समापन का संकेत दे रहे हैं
दरअसल कुंभ की परंपरा से कढ़ी पकौड़े की थाली का काफी प्राचीन संबंध है.
कुंभ के समापन में कढ़ी पकौड़े का भोज है तो इसके साथ संतो का एक नारा भी लगता है और वो नारा है.....कढ़ी पकौड़ा बेसन का, रास्ता पकड़ो स्टेशन का. और इसके पीछे वजह यै हि प्राचीन समय में केवल ट्रेन की व्यवस्था कुंभ में आने जाने के लिए होती थी इसलिए कढ़ी पकौड़े के भोज का संबंध रेलवे स्टेशन से जुड़ गया.
कुंभ की बात करें तो 2 खाद्य पदार्थों का इससे अटूट संबंध है. पहला है खिचड़ी और दूसरा है कढ़ी पकौड़ा. कुंभ का संबंध कढ़ी पकौड़े से क्या है ये तो आपने समझ लिया लेकिन चलिए अब आपको खिचड़ी का संबंध भी कुंभ से क्या है वो समझाते हैं.
देश में 4 जगहों पर लगने वाले कुंभ की बात करें तो सभी जगहों पर भव्य पेशवाई और शोभा यात्रा के साथ 13 अखाड़े कुंभ क्षेत्र में प्रवेश करते हैं. और पेशवाई की वही परंपरा खिचड़ी के साथ जुड़ी हुई है. दरअसल परंपरा और मान्यता यह है कि पेशवाई के साथ अपने शिविर में प्रवेश करने के बाद संत खिचड़ी का भोग बनवाते हैं, बांटते हैं और वही खाते हैं. पेशवाई के साथ ही साथ खिचड़ी का भोज भी कुंभ के शुभारंभ का ऐलान करता है.

प्रयागराज कुंभ में कीर्तन के साथ कढ़ी पकौड़े का भोज शुरु हो चुका है. कुंभ का समापन हो रहा है, कढ़ी पकौड़े के भोज का आरंभ हो रहा है. कहीं पर पंरपराओं पर विराम लग रहा है तो कहीं पर विराम में भी आनंद की वर्षा वाला भजन हो रहा है. यही है कुंभ, यही है कुंभ की विशालता, यही है कुंभ का समावेशी स्वरूप. जहां न शोक है, न संतप्तता है. यहां कुछ है तो अंत में भी आनंद का उल्लास और भजन में सराबोर होते संतों का कढ़ी पकौड़ा भोज