नई दिल्ली, अनुपम खेर अभिनीत फिल्म The Accidental Prime Minister का ट्रेलर रिलीज होने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह फिर सुर्ख‍ियों में आ गए हैं. यह चर्चा एक बार जोर पकड़ रही है कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार नहीं थे, बल्कि 'एक्सीडेंटल पीएम' थे यानी उन्हें संयोग से यह पद मिल गया था. लेकिन अगर हम देश के आजादी के बाद के इतिहास पर गौर करें तो ऐसा नहीं है कि मनमोहन सिंह अकेले ही एक्सीडेंटल पीएम हों, देश के आधे से ज्यादा पीएम एक्सीडेंटल ही थे, यानी अचानक ही उनका नाम सामने आ गया था. इनमें गांधी परिवार के इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी शामिल थे.

विदेशी मूल के विवाद की वजह से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पीएम बनने से इंकार कर दिया था और यह पद मनमोहन सिंह को सौंप दिया गया. वह इस पद पर 22 मई 2004 से 26 मई 2014 यानी पूरे दस साल रहे. यह फिल्म मनमोहन सिंह के पीएम रहने के दौरान उनके मीडिया एडवाइजर रहे संजय बारू की किताब 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' पर आधारित है. बारू को मई 2004 में प्रधानमंत्री का मीडिया सलाहकार बनाया गया और वो अगस्त 2008 तक इस पोजिशन पर काम करते रहे. इस दौरान उनकी नजर पीएमओ के कामकाज पर रही. वह केवल मीडिया सलाहकार ही नहीं वो तब पीएम के मुख्य प्रवक्ता भी थे. आइए जानते हैं कि ऐसे कौन से और पीएम हुए जिनका नाम अचानक सामने आ गया.

1. इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी को देश का पहला एक्सीडेंटल पीएम माना जा सकता है. साल 1966 में ताशकंद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया. वे 24 जनवरी 1966 को देश की प्रधानमंत्री बनी थीं. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 11 जनवरी 1966 में ताशकंद में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का निधन हो चुका था. गुलजारी लाल नंदा कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाए गए थे. मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, गुलजारी लाल नंदा पीएम पद के दावेदारों में थे. इसी के बीच नेहरू के वफादारों ने इंदिरा का नाम भी आगे कर दिया, जो लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना-प्रसारण मंत्री थीं. चुपचाप रहती थीं. कांग्रेस संगठन के लोगों की नजरों में वह 'गुड़िया' थीं.
 

2. चौधरी चरण सिंह

1977 में हुए लोकसभा के चुनाव में इंदिरा गांधी बुरी तरह से हार गईं और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई. जनता पार्टी की सरकार बनी. मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने. चरण सिंह इस सरकार में उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री रहे. पर जनता पार्टी में कलह हो गई. मोरार जी की सरकार गिर गई. बाद में कांग्रेस के ही सपोर्ट से 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. उन्हें उस साल 20 अगस्त तक का टाइम दिया गया था बहुमत साबित करने के लिए. लेकिन इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त को समर्थन वापस ले लिया. सरकार गिर गई. संसद का बगैर एक दिन सामना किए चरण सिंह को रिजाइन करना पड़ा. इस तरह वह महज 28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक प्रधानमंत्री पद पर रहे.

3. राजीव गांधी

साल 1984 में 31 अक्टूबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई. इससे अचानक देश में नेतृत्व का संकट आ खड़ा हुआ. ऐसे में इंदिरा के बड़े बेटे राजीव गांधी को बुलाकर देश की कमान की सौंप दी गई. वह देश के सातवें और भारतीय इतिहास में सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री थे. वे राजनीति में नहीं आना चाहते थे, लेकिन हालात ऐसे बने कि वो राजनीति में आए और देश के सबसे युवा पीएम के रूप में उनका नाम दर्ज हो गया. वह एक एयरलाइन पायलट की नौकरी करते थे और उसी में खुश थे. साल 1980 में छोटे भाई संजय गांधी की हवाई जहाज दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के बाद मां इंदिरा का सहयोग देने के लिए उन्होंने राजनीति में एंट्री की. राजीव गांधी लोकसभा सांसद बने. इसके बाद 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वे प्रधानमंत्री बने. वह 31 अक्टूबर 1984 से 2 दिसंबर 1989 तक देश के प्रधानमंत्री रहे. तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदुर में 21 मई, 1991 को आम चुनाव के प्रचार के दौरान एलटीटीई के एक आत्मघाती हमलावर ने उनकी हत्या कर दी.

4. चंद्रशेखर

एक अनोखे घटनाक्रम में साल 1990 में समाजवादी जनता पार्टी के नेता चंद्रशेखर ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई और 10 नवंबर 1990 को देश के प्रधानमंत्री बने, हालांकि वह सिर्फ छह महीने इस पद पर रहे. लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तारी के बाद बीजेपी ने वीपी सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था. उस वक्त नेतृत्व परिवर्तन कर सरकार बचाने का भी विकल्प था, लेकिन उसके लिए वीपी सिंह तैयार नहीं थे. तभी राजीव गांधी ने चंद्रशेखर से संपर्क किया. चंद्रशेखर के नेतृत्व में जनता दल में टूट हुई. 64 सांसदों का एक धड़ा अलग हुआ और उसने सरकार बनाने का दावा ठोंक दिया. राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने उन्हें समर्थन दिया.  लेकिन यह समर्थन सिर्फ छह महीने चला और 21 जून 1991 को चंद्रशेखर को इस्तीफा देना पड़ा.

5. पीवी नरसिंह राव

पेशे से कृषि विशेषज्ञ एवं वकील राव राजनीति में आए और कांग्रेस सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला, लेकिन पीएम पद पर उनका चयन एक्सिडेंटल ही कहा जाएगा. चंद्रशेखर के 21 जून 1991 को इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस ने सरकार बनाई और पीवी नरसिंह राव ने देश की कमान संभाली. उनका चयन भी एक चौंकाने वाले घटनाक्रम के तहत हुआ. वह प्रधानमंत्री पद पर 16 मई 1996 तक ही रहे. 1989 में सत्ता में आया जनता दल 1991 आते-आते भीतरी टूट की वजह से लस्त-पस्त हो गया था. 1991 के आम चुनाव में कांग्रेस ‘विकलांग वापसी’ करने में कामयाब रही, लेकिन वह अपने नेता राजीव गांधी को खो चुकी थी, ऐसे में अचानक नरसिम्हा राव का नाम सामने आया और वह देश के नए प्रधानमंत्री बने.

6. एचडी देवगौड़ा

जनता दल नेता एचडी देवगौड़ा का पीएम बनना भी बेहद चौंकाने वाला था. हालांकि बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस के हाथ खींच लेने से उनकी पारी दस माह में ही खत्म हो गई. वे 1 जून 1996 को देश के प्रधानमंत्री बने और करीब एक साल बाद ही 21 अप्रैल, 1997 को इस पद से उन्हें हटना पड़ा. वह यूनाइटेड फ्रंट सरकार की पहली तीन पसंद में भी शामिल नहीं थे. इससे पहले, राष्ट्रीय फलक पर उनका नाम किसी ने नहीं सुना था. उस साल हुए लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस 140 सीटों के साथ दूसरे नंबर की पार्टी थी, लेकिन बहुमत का जुगाड़ उसके पास भी दूर-दूर तक नहीं था. उसके बाद नंबर था राष्ट्रीय मोर्चे का, जिसके पास कुल 79 सीटें थीं. इस मोर्चे के मुखिया यानि जनता दल के एचडी देवगौडा कुछ दिन पहले ही विधानसभा चुनाव जीतकर कर्नाटक में मजे से अपनी सरकार चला रहे थे. उनकी पार्टी के पास लोकसभा के कुल 46 सांसद थे.  बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस ने बड़ा दांव चला और राष्ट्रीय मोर्चा को बाहर से सम‌र्थन देते हुए सरकार बनाने का ऑफर दिया. ऐसे में देवगौड़ा तुरंत तैयार हो गए और अपने 46, समाजवादी पार्टी के 17, तेलगुदेशम पार्टी के 16 विधायकों के साथ सरकार बनाने का दावा कर दिया.

7. इंद्रकुमार गुजराल

अप्रैल, 1997 में सरकार को बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया. गहरे राजनीतिक संकट और चुनाव को टालने के लिए संयुक्त मोर्चा और कांग्रेस के बीच एक समझौता हुआ. नतीजतन एचडी देवगौड़ा ने इस्तीफा दे दिया. इंद्र कुमार गुजराल को संयुक्त मोर्चा का नया नेता चुना गया और 21 अप्रैल, 1997 को वह देश के 12वें प्रधानमंत्री बने. नवंबर, 1997 में जैन कमीशन के मामले पर कांग्रेस ने उनकी सरकार से समर्थन खींच लिया. 28 नवंबर, 1997 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया. वह कुल मिलाकर 11 महीने प्रधानमंत्री रहे, जिनमें से तीन महीने वह केयर टेकर सरकार के मुखिया रहे. पत्रकार राजदीप सरदेसाई की एक किताब में छपे किस्से के मुताबिक भोर में इंद्र कुमार गुजराल को जगाकर यह बताया गया था कि वे देश के अगले पीएम बनने जा रहे हैं.